:
Breaking News

भीरहा गांव में 300 साल पुरानी ब्रज शैली की होली: फगुआ पोखर गुलाबी, रंगों और संस्कृति का महोत्सव

top-news
https://maannews.acnoo.com/public/frontend/img/header-adds/adds.jpg

समस्तीपुर जिले का भीरहा गांव अपनी 300 साल पुरानी ब्रज शैली की होली के लिए एक बार फिर चर्चा में है। फागुन के आगमन के साथ ही पूरा गांव उत्साह, आस्था और परंपरा के महासंगम में डूबा हुआ है। यह सिर्फ एक सामान्य होली नहीं, बल्कि सदियों पुरानी विरासत का जीवंत दस्तावेज है। भीरहा की होली की ब्रज शैली थीम इसे पूरे बिहार में विशेष बनाती है। गांव के बुजुर्गों के अनुसार लगभग 250-300 साल पहले गांव के पूर्वज वृंदावन गए थे, जहां की होली की झलक देखकर वे मंत्रमुग्ध हुए और अपने गांव में इसे लागू करने की योजना बनाई। वर्ष 1935 में कुछ ग्रामीण पुनः वृंदावन से लौटे और 1936 से इसे भव्य रूप दिया गया। इस परंपरा का उल्लेख राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने भी किया था। इस वर्ष आयोजन उसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को ध्यान में रखकर किया जा रहा है, ताकि नई पीढ़ी अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ सके। इस बार भीरहा की होली का  उत्सव में आधुनिक रंग हौज, विशेष डीजे नाइट, प्रतियोगिता नामी बैंड पार्टियों का आमंत्रण और ब्रज की तर्ज पर भव्य संध्या आरती जैसे आकर्षण होंगे। रंग हौज के माध्यम से पंप और यांत्रिक उपकरणों से हवा में रंगों की फुहार छोड़ी जाएगी, जिससे पूरा वातावरण सतरंगी हो उठेगा। होलिका दहन की रात से ही सांस्कृतिक कार्यक्रम शुरू होंगे, जिसमें पारंपरिक लोकगीत, नृत्य और फगुआ की तान गूंजेगी। भीरहा की होली की सबसे बड़ी खूबसूरती इसकी सामाजिक समरसता है; धर्म, जाति और वर्ग की दीवारें ढह जाती हैं और पूरा गांव एक परिवार बन जाता है। फगुआ पोखर इस होली की पहचान है, जहां हजारों श्रद्धालु अपनी पिचकारियों से पानी को गुलाबी कर देते हैं। इस दृश्य में भाईचारे और उत्साह की झलक स्पष्ट होती है। गीत-संगीत की धुनों पर थिरकते लोग मिथिलांचल की धरती को लघु वृंदावन बना देते हैं। इसके अलावा, समस्तीपुर जिले के अन्य गांवों में भी पारंपरिक होली जैसे धुरखेली, कीचड़ वाली होली और हंड़िया टांगने की परंपराएं जीवित हैं। बताते चलें कि,होलिका दहन की अग्नि जब गांव-गांव में प्रज्वलित होती है, तो वह केवल बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक नहीं रहती, बल्कि आने वाले रंगोत्सव की औपचारिक घोषणा बन जाती है। बिहार में होली एक दिन का रंग खेलने भर का अवसर नहीं, बल्कि हफ्तों तक चलने वाली सांस्कृतिक परंपरा का जीवंत उत्सव है। यहां होली का अर्थ है—फगुआ की थाप, चौपाल की महफिल, लोकगीतों की अनुगूंज, सामाजिक समरसता का संगम और पीढ़ियों से चली आ रही विरासत का पुनर्जीवन।

बसंत पंचमी के साथ ही होली का रंग चढ़ना शुरू हो जाता है। इस दिन मां सरस्वती की पूजा के बाद गांवों में फगुआ गाने की परंपरा आरंभ होती है। ढोलक, मंजीरा और झाल की संगत में राधा-कृष्ण, राम-सीता और शिव-पार्वती के होली गीत गूंजते हैं। खेत-खलिहान, आंगन और मंदिर—हर स्थान पर बसंत की मस्ती और फाग का रंग घुल जाता है। यह सिलसिला होलिका दहन तक निरंतर चलता है और फिर रंगों की धूम में बदल जाता है।
मिथिला क्षेत्र में होली की अपनी विशिष्ट पहचान है। दरभंगा और आसपास के ग्रामीण इलाकों में ‘डंफा’ की थाप पर होलिका दहन और फगुआ गायन आज भी परंपरा का जीवंत स्वरूप है। कभी बच्चों की टोली घर-घर जाकर गोइठा और लकड़ी मांगती थी, गीत गाते हुए चंदा इकट्ठा करती थी और उसी से होलिका सजाई जाती थी। यह केवल रस्म नहीं, सामूहिक भागीदारी का प्रतीक था। यद्यपि समय के साथ यह परंपरा कुछ स्थानों पर कमजोर पड़ी है, फिर भी जहां यह जीवित है, वहां सामाजिक एकता की मिसाल कायम करती है।
भागलपुर की भस्म होली बिहार की होली को अलग रंग देती है। भागलपुर में राख और अबीर का संगम महादेव भक्ति के साथ होता है। यहां होली केवल रंगों की उछाल नहीं, बल्कि आध्यात्मिक आस्था का भी उत्सव है। भक्तगण भस्म और गुलाल से सराबोर होकर पारंपरिक गीतों के बीच पर्व मनाते हैं।
राजधानी पटना में होली का शहरी स्वरूप भी कम दिलचस्प नहीं है। यहां ‘बसिऔरा होली’ की परंपरा वर्षों से चली आ रही है। रंगों से भरे ड्रमों के साथ जुलूस निकलते हैं, युवा टोली ढोल-नगाड़ों के साथ सड़कों पर उतरती है और मोहल्लों में सामूहिक रंगोत्सव का आयोजन होता है। दानापुर क्षेत्र में भी इस परंपरा की खास पहचान है।
कोसी अंचल में सहरसा जिले के बनगांव की ‘घमौर होली’ सामाजिक समरसता की मिसाल मानी जाती है। यहां होली एक दिन पहले खेली जाती है। गांव के लोग कंधों पर बैठकर पारंपरिक खेल और जोर-आजमाइश करते हैं। मान्यता है कि संत लक्ष्मीनाथ गोसाईं ने इस परंपरा की शुरुआत की थी। भगवती स्थान में सामूहिक फाग गाए बिना यहां किसी की होली पूर्ण नहीं मानी जाती। राज्य सरकार के सहयोग से यह आयोजन अब राजकीय स्वरूप भी ले चुका है।
मगध क्षेत्र—विशेषकर औरंगाबाद और अरवल—में ‘झूमटा’ की परंपरा आज भी जीवित है। पहले बैलगाड़ियों पर टोली निकलती थी, अब ट्रैक्टर और पिकअप वाहन इसका हिस्सा बन गए हैं, लेकिन ढोल-झाल और सामूहिक गायन की परंपरा जस की तस है। गांव-गांव में लोग टोली बनाकर एक-दूसरे के यहां जाते हैं, रंग लगाते हैं और फगुआ गाते हैं।
जहानाबाद में महिलाओं की मटका-फोड़ होली विशेष आकर्षण का केंद्र होती है। महिलाएं सामूहिक रूप से गीत गाती हैं और परंपरागत खेलों में भाग लेती हैं। ओबरा प्रखंड के कारा गांव की ‘बुढ़वा मंगल’ परंपरा भी अनूठी है, जहां बुजुर्गों को विशेष सम्मान दिया जाता है और सामूहिक भोज का आयोजन होता है।
बिहार की होली का एक महत्वपूर्ण पहलू उसका संगीत है। फगुआ के बाद चैत माह में यही स्वर ‘चैता’ में परिवर्तित हो जाता है। यह केवल गीत का बदलाव नहीं, बल्कि ऋतु परिवर्तन और सांस्कृतिक निरंतरता का संकेत है। लोकगायकों की मंडलियां गांव-गांव घूमती हैं और पूरी रात चैता गाकर माहौल को जीवंत रखती हैं।
समय के साथ कुछ कुरीतियां भी रही हैं—जैसे कीचड़ या हंड़िया वाली होली—लेकिन सामाजिक जागरूकता के कारण इनमें कमी आई है। अब फूलों की होली, प्राकृतिक अबीर-गुलाल और हर्बल रंगों का चलन बढ़ रहा है। पर्यावरण और स्वास्थ्य के प्रति सजगता ने इस पर्व को और संतुलित बनाया है।
बिहार की होली में केवल रंगों का खेल नहीं, बल्कि रिश्तों की मरम्मत भी शामिल होती है। पुराने मनमुटाव भूलकर लोग गले मिलते हैं, अबीर लगाते हैं और मिठाई खिलाते हैं। गांवों में सामूहिक भोज, शहरों में सांस्कृतिक कार्यक्रम और परिवारों में पारंपरिक पकवान—सब मिलकर इस उत्सव को पूर्णता देते हैं।
कुल मिलाकर, बिहार में होली लोकजीवन का महापर्व है—जहां परंपरा और आधुनिकता, आध्यात्म और उल्लास, संगीत और रंग—all एक साथ बहते हैं। हर जिले की अपनी पहचान, हर गांव की अपनी शैली और हर घर का अपना रंग इस उत्सव को अनोखा बनाता है। यही विविधता और जीवंतता बिहार की होली को देशभर में विशिष्ट स्थान दिलाती है।

https://maannews.acnoo.com/public/frontend/img/header-adds/adds.jpg

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *