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भीरहा गांव में 300 साल पुरानी ब्रज शैली की होली: फगुआ पोखर गुलाबी, रंगों और संस्कृति का महोत्सव
- Reporter 12
- 03 Mar, 2026
समस्तीपुर जिले का भीरहा गांव अपनी 300 साल पुरानी ब्रज शैली की होली के लिए एक बार फिर चर्चा में है। फागुन के आगमन के साथ ही पूरा गांव उत्साह, आस्था और परंपरा के महासंगम में डूबा हुआ है। यह सिर्फ एक सामान्य होली नहीं, बल्कि सदियों पुरानी विरासत का जीवंत दस्तावेज है। भीरहा की होली की ब्रज शैली थीम इसे पूरे बिहार में विशेष बनाती है। गांव के बुजुर्गों के अनुसार लगभग 250-300 साल पहले गांव के पूर्वज वृंदावन गए थे, जहां की होली की झलक देखकर वे मंत्रमुग्ध हुए और अपने गांव में इसे लागू करने की योजना बनाई। वर्ष 1935 में कुछ ग्रामीण पुनः वृंदावन से लौटे और 1936 से इसे भव्य रूप दिया गया। इस परंपरा का उल्लेख राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने भी किया था। इस वर्ष आयोजन उसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को ध्यान में रखकर किया जा रहा है, ताकि नई पीढ़ी अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ सके। इस बार भीरहा की होली का उत्सव में आधुनिक रंग हौज, विशेष डीजे नाइट, प्रतियोगिता नामी बैंड पार्टियों का आमंत्रण और ब्रज की तर्ज पर भव्य संध्या आरती जैसे आकर्षण होंगे। रंग हौज के माध्यम से पंप और यांत्रिक उपकरणों से हवा में रंगों की फुहार छोड़ी जाएगी, जिससे पूरा वातावरण सतरंगी हो उठेगा। होलिका दहन की रात से ही सांस्कृतिक कार्यक्रम शुरू होंगे, जिसमें पारंपरिक लोकगीत, नृत्य और फगुआ की तान गूंजेगी। भीरहा की होली की सबसे बड़ी खूबसूरती इसकी सामाजिक समरसता है; धर्म, जाति और वर्ग की दीवारें ढह जाती हैं और पूरा गांव एक परिवार बन जाता है। फगुआ पोखर इस होली की पहचान है, जहां हजारों श्रद्धालु अपनी पिचकारियों से पानी को गुलाबी कर देते हैं। इस दृश्य में भाईचारे और उत्साह की झलक स्पष्ट होती है। गीत-संगीत की धुनों पर थिरकते लोग मिथिलांचल की धरती को लघु वृंदावन बना देते हैं। इसके अलावा, समस्तीपुर जिले के अन्य गांवों में भी पारंपरिक होली जैसे धुरखेली, कीचड़ वाली होली और हंड़िया टांगने की परंपराएं जीवित हैं। बताते चलें कि,होलिका दहन की अग्नि जब गांव-गांव में प्रज्वलित होती है, तो वह केवल बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक नहीं रहती, बल्कि आने वाले रंगोत्सव की औपचारिक घोषणा बन जाती है। बिहार में होली एक दिन का रंग खेलने भर का अवसर नहीं, बल्कि हफ्तों तक चलने वाली सांस्कृतिक परंपरा का जीवंत उत्सव है। यहां होली का अर्थ है—फगुआ की थाप, चौपाल की महफिल, लोकगीतों की अनुगूंज, सामाजिक समरसता का संगम और पीढ़ियों से चली आ रही विरासत का पुनर्जीवन।
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